: जिला अस्पताल के भोजन में मिली जली रोटी और दाल में कीड़े, तीमारदारों ने काटा हंगामा
Tue, May 28, 2024
Agra. आगरा के जिला अस्पताल में उस समय हंगामा हो गया जब जिला अस्पताल की ओर से मरीजों और उनके तीमारदारों को दूषित भोजन दिया गया। जली हुई रोटी और दाल में कीड़े मिलने को लेकर मरीज और तीमारदार सीएमएस राजेंद्र अरोड़ा के पास पहुंच गए और सभी ने जमकर हंगामा काटा। दूषित भोजन की सीएमएस राजेंद्र अरोड़ा से शिकायत की। दूषित भोजन को देखकर उनके भी होश उड़ गए और सभी को आश्वासन दिया कि वो इस मामले में उचित कार्यवाही करेंगे।
पूरा मामला आगरा के जिला अस्पताल का है। आगरा के जिला अस्पताल में एक निजी कंपनी मरीजों के लिए भोजन सप्लाई करती है। इस कंपनी के कर्मचारी जिला अस्पताल में ही भोजन बनाते हैं और फिर मरीज को देते हैं लेकिन इस भोजन को देने से पहले जिला अस्पताल की डाइटिशियन और अन्य अधिकारी इस भोजन को चेक करते हैं। जिला अस्पताल में मरीजों को दिए जाने वाले भोजन पर हमेशा से ही सवाल खड़े होते रहे लेकिन आज इस भोजन में कीड़े निकल आए। मरीजों को कीड़े वाला भजन वितरित कर दिया गया। निजी कंपनी के कर्मचारियों ने एनआरसी, ईडी और वार्ड में भर्ती मरीजों और उनके तीमारदारी को यह भोजन वितरित कर दिया।
एनआरसी में छोटे-छोटे बच्चे भर्ती होते हैं उनके साथ उनकी मां इस वार्ड में रहती हैं। जब उन महिलाओं को यह भोजन मिला तो जली हुई रोटी देखकर वह हैरान थी लेकिन जब उन्होंने दाल देखी तो दाल में कीड़े तैर रहे थे। इस दूषित भोजन को देखकर महिलाओं में आक्रोश फैल गया। उनका कहना था कि अपने बच्चों के इलाज के लिए यहां आये हैं लेकिन यही अस्पताल उन्हें और बीमार करने में लगा हुआ है।
जिला अस्पताल में जो भोजन बनता है उसे चेक करने की जिम्मेदारी डाइटिशियन से लेकर संबंधित अधिकारियों की होती है लेकिन इस भोजन को चेक करने में खानापूर्ति होती है। इसीलिए आज कीड़े वाला भोजन मरीज और तीमारदारी तक पहुंच गया। इस पूरे मामले को लेकर जब सीएमएस राजेंद्र अरोड़ा से वार्ता हुई तो उनका कहना था कि कुछ महिलाएं इस शिकायत को लेकर आई थी। उन्होंने डाइटिशियन के साथ-साथ भोजन वितरित करने वाली कंपनी से स्पष्टीकरण मांगा है और इस मामले में उचित कार्रवाई होगी। जब उनसे पूछा गया कि वास्तव में भोजन में कीड़े थे तो उनका कहना था कि यह मैं नहीं कह सकता लेकिन महिलाओं की शिकायत यह जरूर थी कि भोजन में कीड़े थे।
: माहवारी स्वच्छता दिवस: सावधानी बरत कर संक्रमण की चपेट में आने से करें बचाव
Tue, May 28, 2024
मिथक और भ्रांतियों पर प्रहार करने का है मौका
"आधी आबादी" को संक्रमण और बीमारियों से बचाती है सही जानकारी
आगरा, 27 मई 2024। माहवारी के समय आधी आबादी मानसिक पीड़ा सहन करने के साथ ही जानकारी का अभाव होने पर संक्रमण की चपेट में आ जाती है। यह कोई बीमारी नहीं है। माहवारी के समय थोड़ी सावधानी बरतकर महिलाएं संक्रामक बीमारियों में चपेट में आने से बच सकती हैं। स्वास्थ्य विभाग भी लगातार आधी आबादी को जागरुक करता रहता है।
मंगलवार को माहवारी स्वच्छता दिवस मनाया जाएगा। इस वर्ष इसकी थीम ‘‘टूगेदर : फॉर अ पीरियड फ्रैंडली वर्ल्ड’’ रखी गई है।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. अरुण श्रीवास्तव द्वारा अपील की गई है कि पीरियड फ्रैंडली वर्ल्ड का हैशटैग अपने सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर जरूर लगाएं और इस मुद्दे पर चर्चा करें। ऐसा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि सही जानकारी किशोरियों और महिलाओं को संक्रमण और बीमारियों से बचाती हैं। सीएमओ ने बताया कि किशोरियों ओर महिलाओं को माहवारी स्वच्छता के बारे में जागरुक करने के लिए निर्देश प्राप्त हो गए हैं। लोगों तक यह संदेश पहुंचाया जा रहा है कि मासिक धर्म या माहवारी शरीर की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसमें साफ सफाई का विशेष महत्व है।
यह भी जानें
मासिक धर्म के दौरान प्रत्येक चार घंटे में सैनेट्री पैड को अवश्य बदल देना चाहिए।
गंदे कपड़ों का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करना है, क्योंकि इससे संक्रमण हो सकता है।
किशोरी सुरक्षा योजना के तहत सभी राजकीय स्कूलों में दस से 19 वर्ष तक की किशोरियों को सरकारी खर्चे पर स्कूल द्वारा सैनेट्री पैड देने का प्रावधान है। इसे पाना हर किशोरी का हक है।
राज्य की स्थिति
राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण पांच (2019-21) के अनुसार प्रदेश में 15 से 24 आयु वर्ग की 72.6 फीसदी महिलाएं माहवारी के दौरान सुरक्षित साधनों का इस्तेमाल कर रही हैं। इस स्थिति में और भी सुधार लाने की आवश्यकता है ताकि महिलाओं को सर्वाइकर कैंसर और यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन आदि बीमारियों से बचाया जा सके।
राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम के नोडल अधिकारी डॉ. संजीव वर्मन बताते हैं मासिक धर्म के दौरान न केवल आराम की आवश्यकता होती है, बल्कि पौष्टिक भोजन का सेवन भी किया जाना चाहिए। मासिक धर्म के दौरान जननांगों को नियमित तौर पर धुलना चाहिए। बहुत सी लड़कियों और महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान पेट में दर्द और कमजोरी की शिकायत होती है। ऐसी अवस्था में ज्यादा दिक्कत होने पर चिकित्सकीय परामर्श लेते हुए दवाओं के साथ-साथ आराम करना चाहिए। सतर्कता का व्यवहार न अपनाने से यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन, ल्यूकोरिया, धाध गिरने जैसी बीमारी के साथ-साथ अन्य कई प्रकार के संक्रमण हो सकते हैं। मासिक धर्म के दौरान हरी साग-सब्जी, ताजे फल, दही, दूध और अंडा का सेवन करना चाहिए। स्वच्छता और खानपान का ध्यान न रखने से एनीमिया का शिकार हो सकती हैं।
जिला महिला अस्पताल के साथिया केंद्र की अर्श काउंसलर रूबी बघेल ने बताया कि आमतौर पर महिलाओं में पीरियड 10 से 48 साल की उम्र के बीच में होता है। यह चक्र महीने में एक बार होता है और तीन से पांच दिन तक रहता है। जब यही चक्र सुचारू रूप से न चले तो इसे अनियमित पीरियड की श्रेणी में रखा जा सकता है। हालाँकि 15-20 दिन की देरी सामान्य ही मानी जाती है, लेकिन यदि यह अंतर महीनों का हो, तो डॉक्टर से सलाह जरुर लें। उन्होंने बताया कि मासिक धर्म के दौरान अनियमित या शारीरिक बदलाव आए तो तुरंत चिकित्सीय सलाह ले। किसी के कहने पर भी घरेलू उपाय स्वयं ना करें। साथिया केंद्र पर किशोरियों की काउंसलिंग के दौरान किशोरियों व अभिभावकों को मासिक धर्म के प्रति किया जा रहा है। साथ ही अगर किसी भी किशोरी 15-16 साल की उम्र के बीच में मासिक धर्म नहीं आता है तो तुरंत चिकित्सा परामर्श ले।
जिला अस्पताल के साथिया केंद्र के काउंसलर अरविंद कुमार ने बताया कि साथिया केंद्र में काउंसलिंग के दौरान मासिक धर्म जागरूकता के लिए किशोरियों को भी मासिक धर्म प्रबंधन के बारे में जानकारी दी जा रही है l
शाहगंज निवासी 18 वर्षीय अंजलि बताती है कि जिला महिला चिकित्सालय (लेडी लॉयल) में मुझे मासिक धर्म के बारे में काउंसलर द्वारा जानकारी दी गई थी, इसके बाद से मैं अपने आसपास के लोगों को महामारी के दौरान होने वाली समस्या के लिए डॉक्टर से संपर्क करने के बारे में सलाह देती हूं। अंजलि ने बताया कि ज्यादातर मासिक धर्म के दौरान सैनेट्री पैड चेंज करना हो या अचानक मासिक धर्म आने पर सार्वजनिक स्थल सैनेट्री पैड बॉक्स ना होने से समस्या आती है, सभी सार्वजनिक स्थलों पर सैनेट्री पैड बॉक्स होना बहुत जरूरी है।
: संक्रमण से बचाव करते हुए क्षय रोग उन्मूलन में जुटी हैं नर्स
Sat, May 11, 2024
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मरीजों के स्वस्थ होने के सफर का बन रहे साथी
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फ्लोरेंस नाइटेंगल के पदचिन्हों पर चल कर रहे मरीजों की सेवा
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नर्स दिवस पर विशेष
आगरा। आमतौर पर लोग टीबी का नाम सुनते ही भयक्रांत हो जाते हैं। टीबी मरीजों के साथ भेदभाव करते हैं। स्टिग्मा डिस्क्रिमिनेशन का स्तर यह है कि पति अपनी पत्नी को छोड़ देता है लोग अपने प्रियजनों को छोड़ देते हैं, लेकिन इन विषम परिस्थितियों में एसएन मेडिकल कॉलेज के टीबी व चेस्ट डिपार्टमेंट के नर्स बिना किसी भयभ्रांति के संक्रमण से लड़ते हुए क्षय रोग उन्मूलन में योगदान दे रही हैं। यह नर्स दिन-रात मरीजों के बीच रहती हैं लेकिन उनके साथ कभी भी भेदभाव का रवैया नहीं अपनाती है। यह टीबी मरीजों की सेवा करती हैं टीबी मरीजों की स्वच्छता का विशेष ध्यान देती हैं। वार्ड की साफ सफाई से लेकर टीबी मरीज को स्नान करवाना, स्पंज बाथ देना पौष्टिक आहार का सेवन कराना, समय से नियमित दवाई का सेवन कराने आदि का विशेष ध्यान रखती हैं। 12 मई को फ्लोरेंस नाइटेंगल के जन्मदिन पर दुनियाभर में नर्स दिवस मनाया जाता है। फ्लोरेंस नाइटेंगल के पदचिन्हों पर चलकर मरीजों की सेवा कर रही हैं।
एसएन मेडिकल कॉलेज के टीबी एंड चेस्ट डिपार्टमेंट के स्टाफ नर्स 50 वर्षीय विनोद शर्मा बताते हैं कि उन्हें नर्सिंग के क्षेत्र में सेवा देते हुए 28 साल हो चुके हैं। वह अपने कैरियर में डॉक्टर बनकर मरीजों की सेवा करना चाहते थे, लेकिन परिस्थितियों के कारण वह डॉक्टर नहीं बन सके और स्टाफ नर्स बनना चुना। उन्होंने तमिलनाडु से नर्सिंग की पढ़ाई की। इसके बाद विभिन्न अस्पतालों में काम किया। वह विभिन्न स्थानों पर बतौर स्टाफ नर्स तैनात रहे। अब बीते दो साल से टीबी एंड चेस्ट वार्ड में कार्यरत हैं। उन्हें एसएन मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. प्रशांत गुप्ता द्वारा उत्कृष्ट कार्य करने के लिए सम्मानित किया जा चुका है।
उन्होंने बताया कि उनके द्वारा मरीजों को उपचार देने क साथ उनका ढांढस भी बंधाया जाता है, हम मरीजों को बताते हैं कि आप सही ट्रीटमेंट लेने स्वस्थ हो सकते हैं। कई बार मरीज सीरियस होने पर अपनी हिम्मत छोड़ देते हैं, लेकिन हम उन्हें ट्रीटमेंट देने के साथ काउंसलिंग भी देते हैं, ज्यादातर मरीज अपनी बीमारी को हरा देते हैं।
उन्होंने बताया कि टीबी एंड चेस्ट डिपार्टमेंट में फीमेल टीबी वार्ड, मेल टीबी वार्ड, एमडीआर टीबी वार्ड, नॉन टीबी वार्ड हैं। नॉन टीबी वार्ड में ऐसे मरीजों को रखा जाता है, जिनकों टीबी नहीं होती है, वहीं एमडीआर टीबी वार्ड में एमडीआर टीबी मरीजों को रखा जाता है. वहीं फीमेल वार्ड में महिला मरीजों और मेल वार्ड में पुरुष मरीजों को एडमिट किया जाता है। विनोद बताते हैं टीबी ऐसा गंभीर रोग है, यदि इसका सही समय पर उपचार न किया जाए तो यह जानलेवा भी हो जाता है। यह बच्चों से लेकर किसी भी उम्र वर्ग के लोगों को हो सकती है। गर्भवती महिलाओं को भी टीबी होने के मामले सामने आते हैं, उन्हें वार्ड में एडमिट किया जाता है। गर्भवती महिला मरीजों का और अधिक ध्यान रखना होता है। विनोद ने बताया कि कई बार मरीजों को खून की उल्टियां भी होती हैं, ऐसे में मरीजों की डॉक्टर द्वारा दिए गए परामर्श के अनुसार उपचार देने के साथ-साथ उनकी साफ-सफाई की जाती है। विनोद शर्मा ने कहा कि मुझे 28 साल मरीजों की सेवा करते हुए हो गए हैं। उन्हें मरीजों की सेवा करके काफी अच्छा लगता है।
एसएन मेडिकल कॉलेज के टीबी एंड चेस्ट डिपार्टमेंट में स्टाफ नर्स के पद पर तैनात 27 वर्षीय बबीता शर्मा ने बताया कि मैं बचपन से ही लोगों की सेवा करना चाहती थी, लोगों की मदद करना मुझे अच्छा लगता था। इसलिए मैंने नर्स बनने का प्रोफेशन चुना और मथुरा स्थित बीसीएस स्कूल ऑफ नर्सिंग से नर्सिंग की पढ़ाई की। इसके बाद एसएन मेडिकल कॉलेज में उनकी जॉब लग गई। उन्हें कोविड वॉरियर अवार्ड भी मिल चुका है। उन्होंने कहा कि यदि आप एक नर्स बनना चाहते हैं तो सबसे पहले आपके मन में सेवा करने का भाव होना चाहिए।
बबीता बताती हैं कि उन्हें मरीजों की सेवा करके एक अलग तरह की आत्मसंतुष्टि मिलती है। काम करते-करते मेरी शिफ्ट कब खत्म हो जाती है मुझे पता ही नहीं चलता। बबीता ने बताया कि स्टाफ नर्स होने के नाते वह मरीजों की केवल सेवा नहीं करती हैं, बल्कि मरीजों और तीमारदारों की काउंसलिंग भी करती है, जिससे कि मरीज उपचार कराए तो उनके मन में खुद को स्वस्थ करने के प्रति भावना जागृत हो और वह जल्दी स्वस्थ हों। इसके साथ ही वह तीमारदारों को भी मरीज का ध्यान रखने का प्रशिक्षण देती हैं। कई बार मरीज गंभीर स्थिति में वार्ड में एडमिट होते हैं। ऐसे में उनकी साफ-सफाई करना, उन्हें स्पॉन्ज बाथ देना जैसी चीजें सिखाते हैं। वह खुद मरीजों को स्पॉन्ज बाथ देती हैं।
संक्रमण से करना होता है बचाव
बबीता ने बताया कि नर्स होने के नाते उनका काम डॉक्टर द्वारा बताए गए सही ट्रीटमेंट को मरीज को देना और उनकी सेवा करना तो है ही, इसके साथ ही सबसे जरूरी है कि मरीजों की सेवा के साथ-साथ अपनी सुरक्षा करना। क्योंकि अस्पताल वह जगह है, जहां पर आपको विभिन्न प्रकार के संक्रमण से बचाव करना होत है। इसलिए हमें सबसे पहले सुरक्षा इंतजामों का ध्यान रखना होता है, जैसे- मास्क पहनना, ग्लब्स का उपयोग करना आदि। बबीता ने बताया कि टीबी एंड चेस्ट वार्ड में टीबी के मरीज भी आते हैं। पल्मोनरी टीबी का संक्रमण फैलता है, इसलिए वार्ड में मरीजों और अपनी सुरक्षा के मानकों का भी ध्यान रखना होता है।
बबीता ने बताया कि उनकी एक ढाई साल की बेटी है। वह ड्यूटी के बाद घर जाती हैं, ऐसे में उन्हें सुरक्षा का अधिक ध्यान रखना होता है। स्टाफ नर्स को अपने साथ-साथ अन्य अपने परिवार की सुरक्षा का ध्यान रखना होता है।
स्टेट टीबी टास्क फोर्स के चेयरमैन और एसएन मेडिकल कॉलेज में क्षय और वक्ष रोग विभाग के अध्यक्ष डा. गजेंद्र विक्रम सिंह ने बताया कि 2025 तक देश को टीबी मुक्त करने के लिए सभी के प्रयासों की जरूरत है। क्षय और वक्ष रोग विभाग के नौ स्टाफ नर्स टीबी मरीजों को परिवार के सदस्यों की तरह सेवा कर रहे हैं, उनके मनोबल को बढ़ाते हैं, भावनात्मक सहयोग भी प्रदान करते हैं, काउंसलिंग के दौरान नर्स संक्रमण से बचाव के बारे में जानकारी देते हैं और यह भी बताते हैं एक बार तीन सप्ताह तक टीबी मरीज दवाई खा लेता है तो उसे संक्रमण का खतरा नहीं रहता है उन्होंने वर्ल्ड नर्स डे के अवसर पर सभी नर्स को बधाई दी है ।