: गर्भावस्था में जरूर कराएं मधुमेह की जांच, जच्चा-बच्चा पर पड़ सकता है असर
Wed, Nov 13, 2024
विश्व मधुमेह दिवस (14 नवम्बर 2024) आज
गर्भवस्था की पहली तिमाही से प्रसव पूर्व जांचें जरूरी
सभी स्वास्थ्य केंद्रों पर जांचों की सुविधा है उपलब्ध
आगरा। गर्भावस्था के दौरान मधुमेह नियंत्रित न हो तो यह गर्भवती के साथ-साथ पैदा होने वाला शिशु के लिए भी मुसीबत बन सकती है। इसलिए गर्भावस्था की पहली तिमाही के दौरान ही गर्भवती को अपनी प्रसव पूर्व जांच करानी चाहिए। इस दौरान रैंडम ब्लड शुगर (आरबीएस) जांच कराई जाती है। जिन गर्भवती में गर्भावस्था में मधुमेह की पुरानी पृष्ठभूमि रही है उनकी प्रथम त्रैमास में ही मधुमेह की सम्पूर्ण जांच कराई जाती है और अन्य गर्भवती की भी दूसरे त्रैमास में मधुमेह की पूरी जांच कराई जाती है ।
बच्चों को टाइप-दो मधुमेह होने की आशंका
मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने डॉ. अरुण श्रीवास्तव ने सभी गर्भवती महिलाओं से अपील करते हुए कहा कि सभी गर्भवती महिलाएं गर्भावस्था की पहली तिमाही से ही अपने नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पर जाकर प्रसव पूर्व जांच अवश्य कराएं। यह जच्चा और पैदा होने वाले बच्चे दोनों के लिए लाभदायक है। उन्होंने बताया कि गर्भावधि मधुमेह में रक्त शर्करा का मान सामान्य से अधिक होता है लेकिन मधुमेह के निदान से कम हो जाता है। गर्भावधि मधुमेह सिर्फ गर्भावस्था के दौरान ही होता है। इससे पीड़ित महिलाओं को गर्भावस्था और प्रसव के दौरान जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है। इन महिलाओं और संभवतः उनके बच्चों को भी भविष्य में टाइप-दो मधुमेह की आशंका अधिक होती है। गर्भावधि मधुमेह का निदान लक्षणों के आधार पर नहीं, बल्कि प्रसवपूर्व जांच के माध्यम से किया जाता है, इसलिए प्रत्येक महिला को गर्भावस्था का पता चलते ही नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पर तुरंत जांच करानी चाहिए। सरकारी अस्पतालों पर न सिर्फ जांच की सुविधा है, बल्कि गर्भावस्था में मधुमेह का पता चलने पर जांच के साथ साथ कुशल इलाज व प्रबंधन से सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित कराया जा रहा है।
एसीएमओ आरसीएच डॉ. संजीव वर्मन ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान मधुमेह के मामले औसतन दस फीसदी से भी कम आते हैं, लेकिन इन मामलों में सतर्कता अधिक जरूरी है। मधुमेह पाए जाने पर गर्भवती को उच्च जोखिम गर्भावस्था (एचआरपी) की श्रेणी में रखा जाता है और सुरक्षित प्रसव होने तक उनकी नियमित निगरानी की जाती है। उन्हें मधुमेह की दवाएं भी चलाई जाती हैं। अगर गर्भधारण करने के पहले से ही महिला मधुमेह पीड़ित है तो गर्भावस्था के दौरान उसे चिकित्सकीय देखरेख में अतिरिक्त सतर्कता बरतनी होगी। मधुमेह पीड़ित महिला को गर्भधारण में भी परेशानी हो सकती है।
गैर संचारी रोग नियंत्रण कार्यक्रम नोडल अधिकारी डॉ. पियूष जैन ने बताया कि जनपद में सरकारी स्वास्थ्य इकाइयों पर 6519 लोगों को मधुमेह के रोगियों को उपचार दिया जा रहा है। इनमें 3563 पुरुष और 2956 महिलाएं हैं। सभी का उपचार किया जा रहा है।
जीवनी मंडी नगरीय स्वास्थ्य केंद्र की प्रभारी चिकित्सा अधिकारी डॉ. मेघना शर्मा ने बताया कि अगर गर्भावस्था में मधुमेह नियंत्रित नहीं रहता है तो शिशु के लिए अधिक दिक्कत बढ़ सकती है। गर्भावस्था के पहले आठ सप्ताह के दौरान शिशु के अंग, जैसे मस्तिष्क, हृदय, गुर्दे और फेफड़े आदि बनने लगते हैं। इस चरण में उच्च रक्त शर्करा का स्तर हानिकारक हो सकता है । इससे शिशु में जन्म दोष, जैसे कि हृदय दोष या मस्तिष्क अथवा रीढ़ की हड्डी में दोष होने की आशंका बढ़ जाती है। गर्भावस्था के दौरान उच्च रक्त शर्करा स्तर के कारण इस बात की आशंका भी बढ़ जाती है कि शिशु समय से पहले पैदा हो जाए या उसका वजन बहुत अधिक हो जाए अथवा जन्म के तुरंत बाद उसे सांस लेने में समस्या हो या रक्त शर्करा का स्तर कम हो जाए। इसकी वजह से गर्भपात या मृत शिशु के जन्म की आशंका भी बढ़ जाती है ।
मधुमेह के कारण शिशु में जटिलताएं :
जन्म के समय अधिक वजनरू मधुमेह से पीड़ित माताओं के शिशु का वजन अधिक हो सकता है, जिससे प्रसव के समय समस्याएं आ सकती हैं।
श्वसन समस्याएंरू शिशु में श्वसन समस्याएं हो सकती हैं, जैसे कि श्वसन की गति धीमी होना।
हृदय समस्याएंरू मधुमेह से पीड़ित माताओं के शिशु में हृदय समस्याएं हो सकती हैं।
मानसिक विकास में देरीरू मधुमेह से पीड़ित माताओं के शिशु में मानसिक विकास में देरी हो सकती है।
गर्भावस्था में मधुमेह की जांच और उपचार :
गर्भावस्था के दौरान मधुमेह की जांच और उपचार बहुत जरूरी है। मधुमेह की जांच के लिए रक्त परीक्षण किया जाता है। यदि मधुमेह की पुष्टि होती है, तो डॉक्टर उपचार की सलाह देते हैं, जैसे कि इंसुलिन थेरेपी और आहार परिवर्तन।
गर्भावस्था में मधुमेह की रोकथाम के उपाय :
स्वस्थ आहार : स्वस्थ आहार लेने से मधुमेह के खतरे को कम किया जा सकता है।
नियमित व्यायाम : नियमित व्यायाम करने से मधुमेह के खतरे को कम किया जा सकता है।
वजन नियंत्रण : वजन नियंत्रण करने से मधुमेह के खतरे को कम किया जा सकता है
: टीकाकरण से वंचित बच्चों को शत प्रतिशत टीकाकरण दें - सीडीओ
Wed, Nov 13, 2024
आगरा। हमारे जनपद में नियमित टीकाकरण, माइग्रेशन परिवारों और टीकाकरण से वंचित वैब (वैक्सीन अवॉइडेंस बिहैवियर) झिझक, उदासीन, प्रतिरोधी परिवारों को मोबिलाइज कर टीकाकरण कराने के लिए राष्ट्रीय नियमित टीकाकरण कार्यक्रम के अंतर्गत बुधवार और शनिवार को छाया एकीकृत ग्राम स्वास्थ्य स्वच्छता पोषण दिवस (वीएचएसएनडी) और यूएचएसएनडी सत्र का आयोजन किया जा रहा है। यह महत्वपूर्ण सत्र प्रशिक्षित एएनएम और आशा कार्यकर्ता के माध्यम से आयोजित किये जा रहे हैं। आयोजित सत्र स्थल पर गर्भवती के टीकाकरण के साथ-साथ शून्य से पांच वर्ष तक के बच्चों को 11 जानलेवा बीमारियों से बचाने के लिए टीकाकरण किया जाता हैं।
मुख्य विकास अधिकारी प्रतिभा सिंह ने नगर वासियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से अपील करते हुए कहा है कि हमारे नगर के स्वस्थ भविष्य के लिए, हमें गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिए टीकाकरण की आवश्यकता है। यह हमारे समाज को सुरक्षित और स्वस्थ बनाने का एक महत्वपूर्ण कदम है। शून्य से पांच वर्ष तक के बच्चों के लिए टीकाकरण बहुत जरूरी है, क्योंकि इससे उन्हें 11 जानलेवा बीमारियों से बचाया जा सकता है। इस कार्यक्रम के माध्यम से, हमारा उद्देश्य है कि हमारे जनपद के सभी नागरिकों को टीकाकरण के महत्व के बारे में जागरूक करना और उन्हें इस सुविधा का लाभ उठाने के लिए प्रेरित करना। मुख्य विकास अधिकारी ने कहा है कि नगर वासियों, आइए मिलकर बच्चों को स्वस्थ बनाएं इस मुहिम को अपने घर और आसपास के लोगों को टीकाकरण के प्रति जागरूक करने से शुरुआत करें, नियमित टीकाकरण के लिए लक्षित परिवारों को टीकाकरण का महत्व समझाएं और टीकाकरण के लाभों से अवगत करते हुए सत्र स्थल पर वंचित बच्चों को शत प्रतिशत टीकाकरण करने में सहयोग प्रदान करें। यह टीकाकरण कार्यक्रम बच्चों को स्वस्थ और सुरक्षित जीवन की शुरुआत करने में मदद करता है। आइए, हम सब मिलकर अपने नगर को स्वस्थ और सुरक्षित बनाएं।
यह प्रमुख टीके हैं जो बच्चों को दिए जाते हैं:
जन्म पर बीसीजी (टीबी के खिलाफ), ओपीवी (पोलियो के खिलाफ), हेपेटाइटिस-बी (हेपेटाइटिस-बी के खिलाफ)
6 सप्ताह पर ओपीवी (पोलियो के खिलाफ),पेंटावैलेंट (डिप्थीरिया, टेटनस, पर्टुसिस, हीमोफिलस इन्फ्लूएंजा टाइप बी, और हेपेटाइटिस-बी के खिलाफ), रोटावायरस वैक्सीन (रोटावायरस के खिलाफ), पीसीवी (न्यूमोकोकल के खिलाफ)
10 सप्ताह पर ओपीवी (पोलियो के खिलाफ),पेंटावैलेंट (डिप्थीरिया, टेटनस, पर्टुसिस, हीमोफिलस इन्फ्लूएंजा टाइप बी, और हेपेटाइटिस-बी के खिलाफ), रोटावायरस वैक्सीन (रोटावायरस के खिलाफ), पीसीवी (न्यूमोकोकल के खिलाफ)
14 सप्ताह पर ओपीवी (पोलियो के खिलाफ), पेंटावैलेंट (डिप्थीरिया, टेटनस, पर्टुसिस, हीमोफिलस इन्फ्लूएंजा टाइप बी, और हेपेटाइटिस-बी के खिलाफ), रोटावायरस वैक्सीन (रोटावायरस के खिलाफ), पीसीवी (न्यूमोकोकल के खिलाफ)
9-12 महीने पर खसरा और रूबेला (एमएमआर) वैक्सीन, जापानी इंसेफेलाइटिस वैक्सीन, न्यूमोकोकल कंजुगेट वैक्सीन
16-24 महीने पर एमएमआर वैक्सीन की दूसरी खुराक, वार्षिक इन्फ्लूएंजा वैक्सीन
यह टीके बच्चों को खतरनाक बीमारियों से बचाने में मदद करते है।
टीकाकरण के लाभ:
बच्चों को जानलेवा बीमारियों से बचाव
गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित प्रसव के लिए तैयारी
समाज में बीमारियों को फैलने से रोकथाम
टीकाकरण के लिए हमारी जिम्मेदारी:
गर्भवती महिलाओं और बच्चों को टीकाकरण के लिए प्रेरित करें
टीकाकरण केंद्रों पर जाने में मदद करें
समाज में टीकाकरण के महत्व के बारे में जागरूकता फैलाएं
: जुकाम रोकने से गल सकती हैं कान की हड्डी
Sun, Nov 10, 2024
तीन दिवसीय 32वीं इंडियन सोसायटी ऑफ ऑटोलॉजी की वार्षिक राष्ट्रीय कार्यशाला में प्रस्तुत किए गए 300 शोध पत्र
1200 प्रतिनिधियों ने कान की बीमारियों पर किया नई तकनीक व इलाज पर मंथन
आगरा। जुकाम में बेवजह दवा लेना खतरनाक हो सकता है। सामान्यतः जुकाम को रोकने के बजाय उसे बहने दें। स्वास्थ के लिए यही लाभकारी है। जुकाम रोकने पर कफ कान के रास्ते बाहर आने से कान बहने, बदबू व कान की हड्डी गलने तक की गम्भीर समस्या हो सकती है। कान की नसें खराब होने पर चेहरे पर टेड़ापन और सुनने में समस्या होने लगती है। फतेहाबाद रोड स्थित होटल जेपी में आयोजित तीन दिवसीय आईसोकॉन (इंडियन सोसायटी ऑफ ऑटोलॉजी) की 32वीं राष्ट्रीय वार्षिक कार्यशाला में आज इंडियन सोसायटी ऑफ ऑटोलाजी के पूर्व अध्यक्ष डॉ. विजेन्द्र (बैंगलुरू) ने बताया की कान की हड्डी गलने पर यदि ऑपरेशन ठीक तरह से न किया जाए तो समस्या दोबारा भी पैदा सकती है।
भटिंडा की डॉ. ग्रेस बुद्धिराजा ने बताया कि कान के ऑपरेशन भी माइक्रोस्कोप के बजाय एंडोस्कोप विधि से अधिक किए जा रहे हैं, जिससे ऑपरेशन के दौरान आने वाली जटिलताओं में कमी आ रही है। डॉ. धर्मेन्द्र गुप्ता ने बताया कि जुकाम सामान्यतः वायरस से होता है, जिसमें दवा नहीं मरीज को आराम करना चाहिए। जब तक कफ में पीलापन न हो जुकाम में दवा लेने की आवश्यकता नहीं है। कफ में पीलापन का मतलब है कि सैकेन्ड्री इनफेक्शन यानि बैक्टीरियल इनफेक्शन है। तभी एंडीबायटिक दवाओं का प्रयोग करना उचित है, वह भी डॉक्टर की सलाह से। बेवजह दवा लेने से कान में समस्या हो सकती है।
बच्चों की आंखों पर चश्मे की तरह कान में नजर आएगी हेयरिंग मशीन
समय रहते अभिभावकों ने ध्यान नहीं दिया तो आजकल के बच्चों की आंखों पर जिस तरह चश्मे नगर आ रहे हैं, कानों में हेयरिंग मशीन नजर आएगी। घंटों तक ईयर फोन लगाकर तेज आवाज में म्यूजिक सुनना, डीजे और बढ़ता ध्वनि प्रदूषण कानों की सुनने की क्षमता पर असर डाल रहा है। कार्यशाला के आयोजन सचिव डॉ. राजीव पचैरी ने जानकारी देते हुए बताया कि कम से कम 10-12 वर्ष की उम्र तक बच्चों को ईयर फोन, हेड फोन जैसे उपकरणों से दूर रखना चाहिए। भविष्य में बच्चों के स्वास्थ्य की दृष्टि से यह घातक हो सकता है।
ताजनगरी में पहली बार सम्पन्न हुई ऑटोलॉजी की सफल कार्यशाला
उप्र में पहली बार ऑटोलॉजी की कार्यशाला सम्पन्न हुई है। जिसका सौभाग्य ताजनगरी को मिला। तीन दिवसीय आईसोकॉन (इंडियन सोसायटी ऑफ आटोलॉजी) की 32वीं राष्ट्रीय वार्षिक कार्यशाला के सफलता पूर्वक सम्पन्न होने पर आयोजन सचिव डॉ. राजीव पचैरी ने सभी सहयोगियों को स्मृति चिन्ह प्रदान कर धन्यवाद देते हुए यह बात कही। आज कार्यशाला में आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. सतीश जैन द्वारा शांतिवेद हॉस्पीटल से 8 लाइव ऑपरेशन भी किए गए। कार्यशाला में देश विदेश से 1200 से अधिक प्रतिनिधियों ने कान की बीमारी व एडवांस इलाज पर मंथन किया। 300 से अधिक शोधपत्र व पीजी विद्यार्थियों के लिए क्विज का आयोजन किया गया। सभी विजेता प्रतिभागियों को स्मृति चिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया। संचालन डॉ. संजय खन्ना व डॉ. रितु गुप्ता ने किया।
इस अवसर पर मुख्य रूप से डॉ. गौरव खंडेलवाल, डॉ. आलोक मित्तल, डॉ. राकेश अग्रवाल, डॉ. मनीष सिंघल, डॉ. एलके गुप्ता, डॉ. दीपा पचैरी आदि उपस्थित थे।