: पेठे की खेती करेगी यमुना मैया के प्रदूषण को मुक्त
Sun, Dec 17, 2023
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कौशाम्बी फाउंडेशन व डिपार्टमेंट ऑफ हिस्ट्री एंड कल्चर के संयुक्त संयोजन से संस्कृति विभाग में तीन दिवसीय कार्यशाला में आज रिसर्च पेपर प्रिजेन्ट किए गए
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इंटरनेशनल कांफ्रेंस इन मल्टीडिसिप्लिनरी रिसर्च एंड प्रैक्टिस फार सस्टेनेबल डलवपमेंट एंड इनोवेशन कार्यशाला में इटली, यूएस, कनाडा, श्रीलंका सहित 500 से अधिक प्रतिनिधि ले रहे भाग
आगरा। ताजनगरी में यमुना के प्रदूषण को पेठे की खेती दूर करेगी। खरबूज व तरबूज की तरह यमुना किनारे पेठे की खेती की जाए तो यमुना के पानी में हैवी मैटेल (जिंक, कैड्मियम, लेड, निकिल, क्रोमियम) जैसे प्रदूषण को दूर किया जा सकता है, जो कैंसर सहित कई घातक रोग के लिए जिम्मेदार हैं। सेंट जॉन्स कालेज में वनस्पति विभाग की शोधार्थी तलद खान ने आज विवि के संस्कृति विभाग में कौशाम्बी फाउंडेशन, नीलम ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन व डिपार्टमेंट ऑफ हिस्ट्री ड कल्चर से संयुक्त संयोजन में इंटरनेशनल कांफ्रेंस इन मल्टीडिसिप्लिनरी रिसर्च एंड प्रैक्टिस फार सस्टेनेबल डलवपमेंट एंड इनोवेशन में अपने शोधपत्र प्रस्तुत करते हुए बताया कि फाइटोरेमीडेशन ऑफ हैवी मैटेल कन्टेमिनेशन वॉटर एंड सोइल ऑफ यमुना रिवर विषय पर तीन वर्ष के शोध के दौरान यह नतीजे प्राप्त किए। कहा कि कैलाश मंदिर, दयालबाग इंडस्ट्रीयल क्षेत्र, धांधुपुरा क्षेत्र में माह में तीन बार अलग-अलग समय पर यमुना के पानी की जांच की गई। जहां ट्रीटमेंट किए बगैर व्यवसायिक व सीवर का पानी सीधे यमुना में डाला जाता है। यहां यमुना की मिट्टी में हैवी मैटेल की मात्रा बहुत अधिक थी, जो न के बराबर होनी चाहिए। हैवी मैटेल, लिवर, किडनी सहित कैंसर जैसे रोगों के लिए भी जिम्मेदार हैं। हमने अपने शोध में पाया कि कुकरविटेसी फैमिली का पौधा बेनिनकेसा हिस्पेडा (पेठा) की पौध हैवी मैटेल के प्रदूषण को सबसे अधिक मात्रा में शोषित कर लेता है, जिससे यमुना के पानी व मिट्टी में मौजूद हैवी मैटेल का प्रदूषम तेजी से कम हुआ। यानि कुकरबिटेसी फैमिली के तरबूज और खरबूज की खेती साथ पेठे की खेती यमुना किनारे की जाए तो यमुना के प्रदूषण तो तेजी से काफी कम किया जा सकता है।
मिलीग्राम/प्रति किग्रा
सामान्य स्थिति में पेठे के पौधे से ट्रीटमेंट के बाद केंचुए की खाद के साथ ट्रीटमेंट
जिंकः 383 200 64
निकिलः 120 28 22
लेडः 202 58 44
कैड्मियमः 52 24 26
क्रोमियमः 249 122 87
वहीं जवाहरलाल नेहरू एग्रीकल्चरल विवि के एक्सटेंन्सन एजूकेशन टीकमगढ़ कैम्पस के अध्यक्ष डॉ. एसपी सिंह ने बताया कि किस तरह से उनके संस्थान में भारतीय अनुसंधान परिषद से प्राप्त परियोजना प्रोजेक्ट के तहत ग्लूटन फ्री गेंहूं के बीज तैयार किए जा रहे हैं। ग्लूटन फ्री गेंहूं से तैयार आटे में खिंचाव कम और स्वास्थ्य के लिए अधिक लाभदायक होता है। नैनों तकनीक के जरिए जीन्स में परिवर्तन कर फसल, फल और फूलों की ऐसी नस्लें तैयार की जा रही हैं जिन पर बीमारियां नहीं लगती। जिस कारण कीटनाशकों का प्रयोग नहीं करना पड़ता। बताया कि मप्र गेंहूं की पैदावार के लिए बहुक बड़ा क्षेत्र है। परन्तु कुछ क्षेत्रों में पानी की कमी है। इसलिए ऐसे बीच बी तैयार किए गए हैं, जिन की सिंचाई में कम पानी का प्रयोग होता है।
खेतों में पराली जलाने से घट रहा फसलों का उत्पादन
आगरा। हरियाणा रोहतक, बाबा मस्तनाथ विवि की डॉ, चंचल मल्होत्रा अपने सिलिकॉन फर्टीलिजर का शोध टमाटर व चावल की फसल पर किया। जिससे टमाटर की फसल मेंलगभग 20 प्रतिशत और चावल की फसल में 120 प्रतिशत उत्पादन बढ़ गया। इतना ही नहीं टमाटर में पाए जाने वाले एंटीकैंसरस लाइकोपीन पिगमेंट की मात्रा भी बढ़ गई। डॉ. चंचल ने बताया कि खेतों में पराली जलाना मिट्टी में सिलिकॉन की कमी होने का सबसे बड़ा कारण है। दक्षिण भारत में सिलिकॉन खाद का प्रयोग काफी किया जा रहा है, परन्तु उत्तर भारत में जागरूकता की कमी है। सामान्यतौर पर सिलिकॉन मिट्टी में पाया जाता है। गेंहूं व धान की फसल सबसे अधिक सिलिकॉन मिट्टी में से शोषित कर लेती है। फसल कटने बाद बची पराली में बहुत अधिक मात्रा में सिलिकॉन पाया जाता है। जिसे किसी तरह नरम बनाकर मिट्टी में मिला दिया जाए तो मिट्टी में सिलिकॉन की कमी नहीं रहेगी। सिलिकॉन को मिट्टी में मिलाने के लिए सिलिकन साल्यूबलाइजेशन बैक्टीरिया का प्रयोग किया जाता है, जिससे पराली नरम होकर मिट्टी में आसानी से घुल जाती है। सिलिकॉन खाद के प्रयोग से मिट्टी में आर्गेनिक कार्बन की मात्रा भी बढ़ जाती है। आर्गेनिक कार्बन की मात्रा खेतों में रसायनिक खाद व कीटनाशकों के प्रयोग से लगातार कम हो रही है। आर्गेनिक कार्बन के बना मिट्टी मृत यानि बालू के समान हो जाती है। सिलिकॉन खाद का प्रयोग तीन वर्ष में एक बार करके ही किसान अपनी फसल की उत्पादकता को बढ़ा सकते हैं।
18 को होगी अवार्ड सेरेमनी
आगरा। कौशाम्बी फाउन्डेशन के चेयरमैन लक्ष्य चौधरी ने बताया कि कार्यशाला में विभिन्न विषयों पर 150 रिसर्च पेपर व 50 पोस्टर प्रस्तुत किए जा रहे हैं। 18 दिसम्बर को सुबह 11 बजे से पुरस्कार वितरण समारोह का आयोजन किया जाएगा। आज रिसर्च पेपर प्रिजेन्टेशन कार्यक्रम का संयोजन विमल मोसाहरी ने किया। इस अवसर पर मुख्य रूप से डॉ. नितिन वाही, प्रियांसी राजपूत, नीतू सिंह, अंकित वर्मा, तुषार चौधरी, संजय कुमार आदि मौजूद रहे।
: प्रयोगशाला में कैद होने से नहीं धरातल पर उतरने से बनेंगे रिसर्चर
Sun, Dec 17, 2023
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कौशाम्बी फाउंडेशन व डिपार्टमेंट ऑफ हिस्ट्री एंड कल्चर के संयुक्त संयोजन से संस्कृति विभाग में तीन दिवसीय कार्यशाला का हुआ शुभारम्भ
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इंटरनेशनल कांफ्रेंस इन मल्टीडिसिप्लिनरी रिसर्च एंड प्रैक्टिस फार सस्टेनेबल डलवपमेंट एंड इनोवेशन कार्यशाला में इटली, यूएस, कनाडा, श्रीलंका सहित 500 से अधिक प्रतिनिधि ले रहे भाग
आगरा। अब परम्परागत रिसर्च चलने वाली नहीं। भारत का इतिहास बहुत सम्वृद्ध है, जो विश्व को संदेश देता है। मल्टीडिसिप्लिनरी रिसर्च के दौर में प्रयोगशाला में कैद होने से रिसर्चर नहीं बनने वाले। इसके लिए धरातल पर उतरना पड़ेगा। हम सबको मिलकर एक ऐसे सिस्टम को खड़ा करना होगा, जिसमें विकास के साथ युवाओं को लाभ भी हो। यह कहना था मिनिस्ट्री एनवायरमेंट ड फारेस्ट्री के एडवायजर प्रो. केएस राणा का। जो विवि के संस्कृति विभाग में कौशाम्बी फाउंडेशन, नीलम ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन व डिपार्टमेंट ऑफ हिस्ट्री ड कल्चर से संयुक्त संयोजन में आयोजित तीन दिवसीय इंटरनेशनल कांफ्रेंस इन मल्टीडिसिप्लिनरी रिसर्च एंड प्रैक्टिस फार सस्टेनेबल डलवपमेंट एंड इनोवेशन कार्यशाला में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे।
कार्यक्रम का शुभारम्भ मुख्य अतिथि मिनिस्ट्री ऑफ एनवायरमेंट एंड फारेस्ट्री के एडवायजर प्रो. के एस राणा ने मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर किया। अतिथियों का स्वागत कौशाम्बी फाउंडेशन के चेयरमैन लक्ष्य चौधरी ने स्मृति चिन्ह प्रदान कर किया। विवि की कुलपति उपस्थित विद्यार्थियों को मल्टीडिसिप्लिनरी रिसर्च की व्याख्या कर विस्तार से समझाया। मुख्य वक्ता विग्नेश त्यागी ने कहा कार्यशाला में सभी विषय समाहित है। शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी भाग ले रहे हैं। किसी एक विषय को किसी एक विषय का अध्ययन करके नहीं जाना जा सकता। सभी विषय एक दूसरे से इंटररिलेटिड हैं। पहले इसकी बहुत आवश्यकता नहीं थी, परन्तु अब भविष्य की चुनौतियों व उसके समाधान के लिए आज मल्टीडिसिप्लिनरी के साथ शोध के क्षेत्र में आगे बढ़े। आगरा विरासत की नगरी है। आज इतिहास को खोजने और जानने में विज्ञान की भी जरूरत है। इतिहास की इस भ्रांति को विज्ञान ने ही दूर किया कि आर्य भारतीय नहीं थे। भ्रांति थी कि अग्रेज, पुर्तगाली, मुगल, खिलजी बाहर से आए इसी तरह आर्य भी बाहर से आए थे। विज्ञान के साक्ष्य डीएनए ने बताया कि आर्य भारतीय थे। कहा सूर्य की मूर्ति एक घोड़ा नहीं सात घोड़े दिखते हैं। 600 वर्ष पहले तक पता नहीं था सूर्य की रश्मि सात रंगों से मिलकर बनी है। विज्ञान ने इस बात को खोजा। यथा पिंडे तथा ब्रामांडे को आज के शोध साबित कर रहे हैं। इस अवसर पर मुख्य रूप से इतिहास व संस्कृति विबाग से अध्यक्ष प्रो. बीडी शुक्ला, सुगम आनन्द, एसपी सिंह, नितिन वाही आदि उपस्थित थीं।
वेद पुराणों में जो लिखा है वह शब्द नहीं मंत्र हैं
आगरा। प्रो. तीर्थेश कुमार सिंह ने कहा कि सस्टेनिबल डबलपमेंट वह है जो अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए भवि,य का भी खयाल रखे। शोध हो या विकास भविष्य की जरूरतों को संरक्षित करते हुए आगे नहीं बढ़ेंगे तो हमारी रिसोर्स समाप्त होते चले जाएंगे। विज्ञान भी दो भागों में विभक्त होता जा रहा है। प्राच्य विज्ञान और आधुनिक विज्ञान। कभी कल्पना किजिए जो कुछ वेदों में बिना किसी उपकरणों की मदद के लिखा गया, चाहें वह एस्ट्रोनॉमी हो वह आज सत्य हो रही है, जब उन्हें उपकरणों से शोध किया जा रहा है। 50 रुपए का पंचांग ग्रहणों के बारे में सटीक व्याख्या करता है जो नासा के बड़े बड़े उपग्रहों पर खर्च करके हो पाते हैं। अब समय आ गया कि हमें आधुनिक उपकरणों के साथ अपने प्राच्य साहित्य में चाहे वेद हो या पुराण, जो लिखा है वह शब्द नहीं मंत्र हैं। उनकी व्याख्या होनी चाहिए। हमें आदत हो चुकी है अपनी चीजों को छोड़कर आगे बढ़ने की। शहरों का विकास तो हो रहा लेकिन समानान्तर रूप से स्लम भी विकसित हो रहे हैं। सरकारी अधिकारी और समाज दोनों जिम्मेदार हैं। सस्टेनिबल डवलपमेंट के लिए गरीबी, खाना, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छ वातारवण, स्वच्छ पानी, क्लीन एनर्जी जैसे सात गोल को पूरा करना बहुत जरूरी है। यह सभी गोल हमारी संस्कृति और संस्कार में पहले से थे। आखिल हम कब विकास की कंक्रीट वाली रेस में सामिल हो गए। पहले के लोग ज्यादा ईकोफ्रेंडली हुआ करते थे। जहां हम आवस्यकता से ज्यादा लेने की बात करते हैं वहीं से पर्यावरण को नुकसान पहुंचाना शुरु कर देते है। हमें पर्यावरण के साथ सहजीवन की तरह जीना चाहिए।
कार्यशाला में देश विदेश के 500 से अधिक प्रतिनिधि ले रहे हैं भाग
आगरा। कौशाम्बी फाउंडेशन के चेयरमैन लक्ष्य चौधरी ने बताया कि कार्यशाला में इटली, यूएस, कनाडा, श्रीलंका, नेपाल, यूगांडा के 50 प्रतिनिधियों सहित देश भर के 500 से अधिक प्रतिनिदि भाग ले रहे हैं। कार्यशाला में विभिन्न विषयों पर 150 रिसर्च पेपर व 50 पोस्टर प्रस्तुत किए जा रहे हैं। 17 दिसम्बर को रिसर्च पेपर ऑन लाइन व ऑफ लाइन प्रस्तुत के जाएंगे। 18 दिसम्बर को समापन समारोह का आयोजन किया जाएगा।
: आगरा के लाल की सौगात सौंपी गयी पीएम मोदी को, गुलदस्ते को देख अचंभित हुए पीएम
Sun, Dec 17, 2023
आगरा के सुप्रसिद्ध समाज सेवी अशोक गोयल के सुपुत्र हैं अनुपम गोयल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहले भी मिल चुकी है सराहना, हर बार करते हैं कुछ अनूठा प्रयास
सूरत में पीएम नरेंद्र मोदी को अनुपम गोयल द्वारा निर्मित अनुपम गुलदस्ते को किया गया भेंट
आगरा। ताजनगरी की प्रतिभा की खुशबू के इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कायल हो गए। रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सूरत डायमंड बुर्स के उद्घाटन पर जो अनुपम भेंट प्रदान की गयी वो आगरा के लाल अनुपम गोयल द्वारा निर्मित थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 29 राज्यों के कपड़े से बनाया गया सुगंधित गुलदस्ता भेंट किया गया था जोकि आगरा के बेटे अनुपम गोयल के संस्थान इंस्टीट्यूट आफ फैशन एंड टैक्नोलोजी में तैयार हुआ था। इस सुगंधित और सुंदर सौगात को देख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अचंभित हो गए और अनुपम गोयल के प्रयास की सराहना की।
गुलदस्ते की विशेषता के बारे में अनुपम गोयल ने बताया कि देश के 29 राज्यों के प्रसिद्ध कपड़ों से गुलदस्ता बनाया गया था जिसमें टेक्निकल टेक्सटाइल के जरिए खुशबू भी डाली गई। गुलदस्ते की सुगंध दो से तीन साल तक रहेगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को यह गुलदस्ता केंद्रीय रेल राज्य मंत्री दर्शना जरदोश और सांसद सीआर पाटिल की ओर से डायमंड बुर्स के उद्घाटन के अवसर पर दिया गया।
अनुपम गोयल ने बताया कि गुलदस्ता संस्थान के छह विद्यार्थियों ने 35 दिन की कड़ी मेहनत से तैयार किया था। गुलदस्ते में बनारसी सिल्क (उत्तर प्रदेश), चामा सिल्क (छत्तीसगढ़), चंदेरी (मध्यप्रदेश), बांधनी (गुजरात), इकत (तेलंगाना), बनाना फेब्रिक (आंध्रप्रदेश), कलमकरी (जम्मू और काश्मीर), कसावु (केरल), इकत (पश्चिम बंगाल), चिकनकारी (उत्तर प्रदेश), संबलपुरी साड़ी (उड़ीसा), मूंगा सिल्क (आसाम) आदि राज्यों के कपड़े शामिल हैं।
बता दें कि अनुपम गोयल, आगरा के प्रसिद्ध समाज सेवी अशोक गोयल, (श्री क्षेत्र बजाजा कमेटी के पूर्व अध्यक्ष और हेल्प आगरा एवं सत्यमेव जयते संस्था के संस्थापक) के सुपुत्र हैं। अनुपम ने अपनी स्कूली शिक्षा होली पब्लिक स्कूल से की है। वर्तमान में अनुपम सूरत में इंस्टीट्यूट आफ डिजाइन एंड टैक्नोलॉजी के नाम से संस्थान संचालित कर रहे हैं। अनुपम के नाम भी कई कीर्तिमान दर्ज हैं। कोरोना काल में उनके द्वारा तैयार किया गया कोविड नारी कवच पूरे देश में उस वक्त चर्चा का विषय बन गया था जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसका मन की बात में जिक्र किया था। नारी कवच को महिलाएं साड़ी के उपर आसानी से पहन सकती थीं। इसके आलावा न्यूयार्क फैशन वीक में उनके संस्थान द्वारा बनाए गए परिधानों को पहन कर महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पत्नी अमृता फडणवीस रैंप वॉक कर चुकी हैं। परिधानों की थीम बेटी बचाओ थी।