आगरा। "अगले दिन सवेरे जब लोग पूरी तरह से घरों से बाहर निकले भी नहीं थे, कि बगैर अखबारों के ही सारे शहर में कानों कान खबर फैल गई, कि कोतवाल ने आत्महत्या कर ली है। लोग मुँह खोले अचरज में इसे सुनते और एक दूसरे को यकीन दिलाते कि एकदम सच बात है। उसने अपने रिवॉल्वर से गोली चलाई है। और उसकी लाश कोतवाली में रखी हुई है। कोतवाली के आहते में एक ओर लाश को सफेद चादर से ढंक कर रख दिया गया था।" ये अंश हैं कहानी 'शहर कोतवाल की कविता' के। कहानी का पाठ आज यहां लखनऊ से पधारे उसके रचनाकार वरिष्ठ हिंदी कथाकार देवेंद्र ने 'किस्सा कहानी-4' कार्यक्रम में मौजूद साहित्य प्रेमी श्रोताओं के समक्ष किया था।
कार्यक्रम का आयोजन सांस्कृतिक संस्था रंगलीला और कहानी की पत्रिका कथादेश ने संयुक्त रूप से किया था। आयोजक एसिड हमलों की शिकार महिलाओं के संगठन शीरोज़ थी। कार्यक्रम का आतिथ्य नागरी प्रचारिणी सभा आगरा का रहा।
नागरी प्रचारिणी सभा आगरा के लाइब्रेरी हॉल में आयोजित इस कार्यक्रम में वरिष्ठ कथाकार शक्ति प्रकाश ने कहानी की समीक्षा करते हुए कहा कि यह कहानी दिखाती है की जब सत्ता निरंकुश हो जाती है, तो किस तरह वह अपनी जनता को पीड़ित करती है। व्यवस्था पर व्यंग्य कहानी का उद्देश्य नहीं बल्कि मशीनी बन चुके लोग बाकी लोगों को बिल्कुल यांत्रिक नजरिए से देखते हैं।
मुख्य वक्ता वरिष्ठ लेखक और कथाकार राजगोपाल सिंह वर्मा ने कहा कि इस कहानी में कालखंड के हिसाब से दृश्य नहीं हैं कई जगह कुछ दृश्य अतिरंजित भी लगते हैं। कहानी में शहर का भी जिक्र नहीं है, इस कहानी में कई पात्र भी आधे-अधूरे से लगते हैं। कई दृश्यों में मनोभावों का भी अभाव दिखता है। यह कहानी अंत में कई ज्वलंत सवाल भी छोड़ करके जाती है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. रामवीर सिंह ने कहा कि यह नौ लाइन की कविता मात्र नहीं है, बल्कि इसके अन्दर एक ऐसी भावना समाहित है, जिसकी वर्षों बाद भी हमें अनुभूति होती है।
अध्यक्षता करते हुए ग्वालियर से पधारे वरिष्ठ कहानीकार महेश कटारे ने करते कहा कि कथाकार देवेंद्र कहानी को एक्सट्रीम में ले जाते हैं। कालजयी कथाकार प्रेमचंद भी कुछ चीजों को अपनी कई कहानियों में एक्सट्रीम पर ले जाते हैं। प्रेमचंद की 'ईदगाह' का 12 वर्ष का बच्चा, क्या 12 कोस चल सकता है?
वरिष्ठ कथाकार डॉ. मधु भारद्वाज ने कहा कि इस कहानी का ताना-बाना बहुत ही खूबसूरती से बना गया है। परिवेश को खूब दिखाती है। वरिष्ठ कवि रमेश पंडित ने कहा अगर कोई कहानी समझ में आ जाएं तो कहानी अपने मकसद में सफल है। कहानी में वर्तनी की गलतियां बहुत हैं। प्रो. आरके भारती ने कहा जब किसी साहित्यिक कृति की समालोचना करते हैं तो व्यक्तिगत संबंध नहीं निभाते। कहानी में कई जगह सुधार की जरूरत है।
विशिष्ट अतिथि 'कथादेश' के संपादक वरिष्ठ साहित्यकार हरि नारायण (नई दिल्ली) थे। हिंदी कहानी और देवेंद्र का रचना संसार विषय पर वरिष्ठ आलोचक प्रियंव अंकित ने विषय प्रवर्तन किया। वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी अनिल शुक्ल ने अभी अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम में राम भरत उपाध्याय, शीलू और सुरेंद्र यादव ने मंचासीन अतिथियों का स्वागत किया। अंत में धन्यवाद ज्ञापन मनोज सिंह ने किया। मनीषा शुक्ला, डॉ. महेश धाकड़, रामनाथ शर्मा, डॉ. गिरजा शंकर शर्मा, नीरज जैन, आर्निका माहेश्वरी, ऋचा निगम, वंदना तिवारी, प्रो. हरि निर्मोही, राम कृपाल सिंह, भानु प्रताप सिंह, शलभ भारती, अभिनय प्रसाद, भारत सिंह, कमलदीप सिंह, शरद गुप्ता, अवधेश उपाध्याय, टोनी फास्टर, माही वी.कुमार, जितेंद्र दीक्षित, अनिल अरोरा आदि मौजूद थे।