Fri 19 Jun 2026
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श्री भगवान परशुराम : शब्द स्वर वंदन में उठा आत्ममंथन का स्वर, युवा पीढ़ी को धर्म से जोड़ने पर जोर

बुद्ध पूर्णिमा पर “श्री भगवान परशुराम: शब्द स्वर वंदन” कार्यक्रम में आध्यात्मिक जागरण और सामाजिक चिंतन पर जोर
• संगोष्ठी, काव्य और भजन के माध्यम से सनातन मूल्यों और सामाजिक सरोकारों पर हुआ चिंतन

आगरा। बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर विप्र फाउंडेशन एवं तारक सेवा संस्था के संयुक्त तत्वावधान में “श्री भगवान परशुराम: शब्द स्वर वंदन” कार्यक्रम का आयोजन संस्कृति भवन, ललित कला संस्थान में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में संगोष्ठी, काव्य-पाठ तथा संगीतमय भजन संध्या के माध्यम से सनातन संस्कृति, आध्यात्मिकता और सामाजिक मूल्यों पर गहन विचार-विमर्श किया गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि प्रो. बल्देव भाई शर्मा (पूर्व कुलपति कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय तथा पूर्व अध्यक्ष, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नई दिल्ली), मुख्य वक्ता श्री महंत योगेश पुरी (श्री मनकामेश्वर मठ), प्रो. लवकुश मिश्रा (डीन, स्टूडेंट्स फॉरेन अफेयर्स, डॉ. बी. आर. अम्बेडकर यूनिवर्सिटी), मधुकर चतुर्वेदी (संगीतज्ञ) द्वारा दीप प्रज्वलन कर किया गया। काशी विश्वनाथ के मंगलाचरण को स्वर प्रदान करते हुए प्रो. उमापति दीक्षित (अध्यक्ष, तारक सेवा संस्था) द्वारा कार्यक्रम की आध्यात्मिक शुरुआत हुई।

मुख्य वक्ता श्री महंत योगेश पुरी ने अपने ओजस्वी एवं विचारोत्तेजक वक्तव्य में उपस्थित जनसमूह को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि भारत ऋषियों और कृषि परंपरा का देश है, किंतु आज भौतिकवाद की अंधी दौड़ में हम अपनी आध्यात्मिक जड़ों से दूर होते जा रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि भगवान परशुराम को किसी एक वर्ग विशेष तक सीमित करना एक भ्रांति है, बल्कि वे समस्त मानवता के आदर्श हैं।

महंत योगेश पुरी ने समाज में बढ़ती धार्मिक उदासीनता पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज हम अपनी परंपराओं और प्रतीकों को अपनाने में संकोच महसूस करते हैं, जबकि अन्य धर्मों के अनुयायी अपनी आस्थाओं के प्रति पूर्ण निष्ठा रखते हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी समाज की मजबूती उसकी पारिवारिक संरचना, संस्कार और ज्ञान पर आधारित होती है, किंतु आज इन मूलभूत तत्वों का ह्रास हो रहा है।

उन्होंने विशेष रूप से ब्राह्मण समाज के आत्ममंथन की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि ब्राह्मणत्व केवल जन्म से नहीं, बल्कि आचरण, ज्ञान और तप से स्थापित होता है। यदि समाज का मार्गदर्शक वर्ग ही अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाए, तो सामाजिक संतुलन बिगड़ना स्वाभाविक है।

महंत जी ने युवाओं को धर्म और संस्कृति से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि वर्तमान समय देश के लिए स्वर्णिम काल है, ऐसे में इतिहास का पुनर्लेखन और सही ज्ञान का प्रसार अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि “शिक्षित व्यक्ति भटक सकता है, किंतु धर्म से दीक्षित व्यक्ति को भटकाया नहीं जा सकता,” इसलिए नई पीढ़ी को केवल औपचारिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि संस्कारयुक्त ज्ञान देना समय की मांग है।

उन्होंने समाज में बढ़ती समस्याओं के समाधान के लिए परिवार और समाज दोनों स्तरों पर सुधार की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि यदि घरों में धार्मिक वातावरण और आचार्यों का मार्गदर्शन नहीं होगा, तो सनातन संस्कृति का संरक्षण कठिन हो जाएगा।

मुख्य अतिथि प्रो. बल्देव भाई शर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि वर्तमान समय में पढ़ने-लिखने की प्रवृत्ति में गिरावट आई है, जो समाज के बौद्धिक विकास के लिए चिंताजनक है। उन्होंने भारतीय समाज की सांस्कृतिक विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए गहन अध्ययन की आवश्यकता बताई।

प्रो. लवकुश मिश्रा ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के अपने परिवार और समाज के प्रति कर्तव्य होते हैं, जिन्हें दिखावे के बजाय वास्तविक ज्ञान और समर्पण के साथ निभाना चाहिए। उन्होंने वर्तमान शिक्षा प्रणाली में व्याप्त कमियों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया।

मधुकर चतुर्वेदी ने वेदों और उपनिषदों के आधार पर ब्राह्मणत्व की व्याख्या करते हुए ज्ञान और अध्ययन की महत्ता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हमें अपने महापुरुषों के जीवन और विचारों का गहन अध्ययन करना चाहिए।

काव्य एवं भजन प्रस्तुति
कार्यक्रम में काव्य-पाठ के अंतर्गत डॉ. रुचि चतुर्वेदी ने “सत्य सनातन को गाती ब्रज धरा धाम को वंदन है…” और सचिन दीक्षित ने “सबसे पहले वंदन कर…” जैसी भावपूर्ण रचनाओं से भगवान परशुराम के प्रति श्रद्धा व्यक्त की। संगीतमय भजन प्रस्तुति संतोष तिवारी द्वारा दी गई, जिसने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। कार्यक्रम का संचालन पदम गौतम ने किया।

इनकी रही उपस्थिति
इस अवसर पर डॉ मनोज पांडेय, डॉ. अजीत कुमार पांडे, बृजेश चतुर्वेदी, प्रभु दत्त उपाध्याय, अशोक गोयल, जितेंद्र फौजदार, मोनिका तिवारी, संतोष तिवारी, आचार्य उमाशंकर पाराशर, संजय कुमार, प्रकाश, रामकुमार सिद्धार्थ, अवधेश उपाध्याय, डॉ. मथुरा प्रसाद गौतम, लक्ष्मण चौधरी, वंदना चौधरी, प्रो बीके सिंह, शाहतोष गौतम, निर्मला दीक्षित, राहुल चतुर्वेदी, निधि चतुर्वेदी, बीआर शर्मा, सीमा शर्मा, हिमानी चतुर्वेदी, मीना शर्मा, प्रदीप, अदिति, आलोक, जयंत, रवि चौबे, निशांत चतुर्वेदी, डॉ आनंद राय, राकेश निर्मल, डॉ. रामेंद्र शर्मा, रवि आदि उपस्थित रहे।

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