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: "भावनात्मक शिक्षा" पर अनोखी पहल, फील सील ओरिएंटेशन बना संवेदना की पाठशाला

Pragya News 24

Mon, Jul 28, 2025
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  • फीलिंग माइंड्स संस्था द्वारा आयोजित “फील सील” ओरिएंटेशन का दूसरा दिन
  • भावनाओं की शिक्षा के लिए देश का इकलौता कार्यक्रम बना परिवर्तन का माध्यम
  • महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों से आए प्रतिभागियों को दिया गया भावनात्मक शिक्षा का प्रशिक्षण

आगरा। देश की शिक्षा प्रणाली में एक नई सोच और संवेदनशील दिशा की शुरुआत करते हुए, फीलिंग माइंड्स संस्था द्वारा आयोजित फील सील ओरिएंटेशन कार्यक्रम का दूसरा दिन भावनात्मक शिक्षा की गहराई में उतरने का सशक्त प्रयास साबित हुआ। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों से आए प्रतिभागियों को न केवल प्रशिक्षित किया गया, बल्कि यह संदेश भी दिया गया कि आज के युग में बच्चों को गणित, विज्ञान और भाषा के साथ-साथ अपनी भावनाओं को पहचानना और व्यक्त करना भी सिखाना उतना ही जरूरी है। रविवार को सिकंदरा बोदला रोड स्थित विमल विहार में चल रहे फीलिंग माइंड्स संस्था के दो दिवसीय “फील सील” ओरिएंटेशन कार्यक्रम के दूसरे दिन का आयोजन भी अत्यंत प्रेरक और प्रभावशाली रहा।
कार्यशाला के दूसरे दिन को संबोधित करते हुए फीलिंग माइंड्स संस्था की संस्थापक एवं अंतर्राष्ट्रीय मनोचिकित्सक डॉ. चीनू अग्रवाल ने कहा कि हमारे स्कूलों में हर विषय पढ़ाया जाता है, लेकिन बच्चों को यह नहीं सिखाया जाता कि भावनाएं क्या हैं, उन्हें कैसे और कब व्यक्त करना चाहिए। इसी के अभाव में आज बच्चे मानसिक रूप से अधिक असुरक्षित और अकेले होते जा रहे हैं। उन्होंने एनसीईआरटी के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि भारत में हर साल करीब 1.25 लाख आत्महत्याएं होती हैं, जिनमें लगभग 13,000 बच्चे शामिल होते हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि बच्चों में खुद को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है।
जब बच्चे परेशानी में होते हैं, तो उन्हें भावनात्मक सहारा देने के बजाय, उन्हें मानसिक रोगी समझकर अस्पताल ले जाया जाता है। यह विडंबना है कि 140 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में मात्र 10,000 पंजीकृत मनोचिकित्सक हैं।

उन्होंने कहा कि आज के दौर में बच्चों को व्यावहारिक रूप से अपनी भावनाएं व्यक्त करने की शिक्षा देना बेहद आवश्यक हो गया है। बच्चों से संवाद का समय न दे पाना और संयुक्त परिवारों में दादा-दादी की कमी भी बच्चों में अकेलेपन को बढ़ावा दे रही है। इसी के समाधानस्वरूप कार्यक्रम में “ग्रैंड पेरेंटिंग” पर आधारित विशेष सेशन की भी योजना बनाई गई है। अगले 6 माह तक प्रशिक्षण प्राप्त शिक्षक पूरे देश में ऑनलाइन क्लासेस के माध्यम से इस अभियान को आगे बढ़ाएंगे। दूसरे दिन की कार्यशाला में भावनाएं कैसे व्यक्त करें, इस पर आधारित कई इंटरएक्टिव सत्र आयोजित किए गए, जिनमें प्रमुख रूप से एक्टिविटी आधारित लर्निंग, फिल्म एवं वार्तालाप विश्लेषण (मूवी वार्ता), जिज्ञासा आधारित खुली चर्चा सत्र शामिल रहे।

डॉ रविंद्र अग्रवाल ने बताया कि यह कार्यक्रम देश का इकलौता संगठित भावनात्मक शिक्षा पर केंद्रित प्रयास है, जो न केवल बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करता है, बल्कि उनके संपूर्ण व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक सिद्ध हो रहा है।
कार्यक्रम में शैलेश जिंदल ने “फील सील (FEEL-SEAL)” का शाब्दिक और व्यावहारिक अर्थ स्पष्ट करते हुए बताया कि यह केवल एक शैक्षिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सोशल, इमोशनल और एकेडमिक लर्निंग का एक समन्वित मॉडल है, जो भावनाओं को शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाता है।

इस अवसर पर हेमा फाउंडेशन द्वारा संचालित हेम सीड्स (सामाजिक, भावनात्मक एवं नैतिक विकास) कार्यक्रम की भी विस्तृत जानकारी दी गई, जो देशभर के स्कूलों में लागू किया जा रहा है।

कार्यशाला के अंत में प्रतिभागियों ने इस अनूठे प्रयास की भूरी-भूरी प्रशंसा की और कहा कि यह पहल शिक्षा की पारंपरिक सोच को बदलने की दिशा में एक क्रांति है, जो बच्चों को सिर्फ ज्ञानी नहीं, बल्कि संवेदनशील, संतुलित और खुशहाल नागरिक बनाने की ओर बढ़ रही है।

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