श्री प्रेमनिधि मंदिर : शरद पूर्णिमा पर श्री प्रेमनिधि मंदिर में सजा महारास का अलौकिक दरबार
Pragya News 24
Sun, Oct 25, 2026
श्वेत डोरिया वस्त्रों और हीरे-मोती के आभूषणों से सजे ठाकुरजी, वैणु धारण कर दिए दिव्य दर्शन; हवेली संगीत में गूंजे रास के पद
आगरा। शरद पूर्णिमा के पावन अवसर पर नाई की मंडी स्थित श्री प्रेमनिधि मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण के महारास की दिव्य अनुभूति कराने वाला विशेष श्रृंगार एवं दर्शन उत्सव आयोजित किया गया। श्वेत डोरिया के वस्त्रों, सुनहरी-चांदी की जरी और हीरे-मोती के आभूषणों से सुसज्जित ठाकुरजी के अलौकिक स्वरूप ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। वैणु धारण किए प्रभु के मनोहारी दर्शन कर भक्त निहाल हो उठे। श्वेत सज्जा और महारास की भावभूमि से सजे मंदिर परिसर में शरद पूर्णिमा की दिव्यता के साथ पुष्टिमार्गीय सेवा परंपरा की अनुपम झलक दिखाई दी।
रासोत्सव के रूप में मनाई जाती है शरद पूर्णिमा
सेवायत हरिमोहन गोस्वामी और सुनीत गोस्वामी ने बताया कि पुष्टिमार्गीय परंपरा में शरद पूर्णिमा को रासोत्सव अथवा रास पूनम के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण के महारास की स्मृति और उनके दिव्य प्रेम के भाव को समर्पित है। इस अवसर पर ठाकुरजी का विशेष श्रृंगार किया गया। श्वेत डोरिया के वस्त्र, जरी की बारीक कारीगरी, हीरे-मोती के आभूषण और विशेष मुकुट सेवा इस उत्सव की प्रमुख विशेषताएं हैं। परंपरा के अनुसार, शरद पूर्णिमा पर ठाकुरजी वैणु धारण करते हैं और इस दिन उनकी शयन सेवा नहीं होती।
श्वेत सज्जा और महारास की पिछवाई ने मोहा मन
शरद पूर्णिमा पर मंदिर की सज्जा भी विशेष रूप से की गई। सेवा स्थल पर श्वेत वस्त्रों की सजावट, द्वारों पर हल्दी से ड्योढ़ी तथा अशोक के पत्तों की बंदरवाल ने उत्सव की शोभा बढ़ाई। महारास के भाव को दर्शाती पिछवाई ने मंदिर के वातावरण को कृष्णमय बना दिया। पारंपरिक सज्जा और सेवा विधान के बीच श्रद्धालुओं ने ठाकुरजी के दिव्य स्वरूप के दर्शन किए।
केसरयुक्त बासोदी से राजभोग तक, विविध व्यंजनों की भोग सेवा
उत्सव के दौरान ठाकुरजी को केसरयुक्त बासोदी यानी खीर, राजभोग तथा मनोर में फैनी, गुजिया, कचौरी, दही-बड़ा, पेड़ा, बर्फी, खट्टे-मीठे दही, दूध-पूरी, विभिन्न प्रकार के फल और तली हुई मेवा अर्पित की गई। वहीं, हवेली संगीत में रास के पदों के गायन के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं के माधुर्य और भक्ति भाव को अभिव्यक्त किया गया।
सेवायतों ने बताया कि पुष्टिमार्गीय परंपरा के अनुसार शरद पूर्णिमा के इस उत्सव पर ‘मान’ एवं ‘पोढ़वे’ के पदों का गायन नहीं किया जाता। सेवा, श्रृंगार, भोग और संगीत की परंपराओं के समन्वय ने उत्सव को विशिष्ट स्वरूप प्रदान किया।
ये रहे उपस्थित
इस अवसर पर आशीष पचौरी, सरदार सिंह धाकड़, सोनू गुप्ता, श्यामजी शिवहरे, हर्ष गुप्ता, राजेश धाकड़ और रानू पचौरी सहित अन्य श्रद्धालु उपस्थित रहे।
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