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श्रीरामकथा : रामकथा पंडाल में गूंजा ‘राधे-राधे’, भक्ति और करुणा का संदेश दे गए बापू

Pragya News 24

Fri, Sep 18, 2026
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आगरा। फतेहाबाद रोड स्थित जेपी वेडिंग ग्राउंड में करुणानिधान परिवार की ओर से आयोजित नौ दिवसीय श्रीरामकथा के चतुर्थ दिवस कथा व्यास मोरारी बापू ने ‘मानस ऋषि पंचमी’ प्रसंग को आगे बढ़ाया। श्रीरामचरितमानस के ऋषि-मुनियों को नमन करते हुए उन्होंने भक्ति, प्रारब्ध, कृपा, गुरु-परंपरा और रामनाम के महत्व पर विचार रखे। कथा के दौरान अचानक राधा नाम का संकीर्तन शुरू हुआ तो पूरा पंडाल ‘राधे-राधे’ के जयघोष से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने सामूहिक संकीर्तन किया और वातावरण भक्ति एवं भावनाओं से भर गया।

‘कृष्ण आश्रय हैं तो राधा अश्रु हैं’
मोरारी बापू ने कहा, “कृष्ण आश्रय हैं तो राधा अश्रु हैं।” उन्होंने राधा को श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति बताते हुए कहा कि जब मनुष्य स्वयं को अकेला अनुभव करे और उसके भीतर से करुणा एवं आर्त भाव की पुकार निकले, तब राधा नाम का स्मरण उसे भक्ति और आश्रय की अनुभूति करा सकता है। उन्होंने कहा कि भक्ति में प्रेम और करुणा की पुकार हो तो मनुष्य का भाव प्रभु तक पहुंचता है।

ऋषि-मुनियों की विचारधारा अलग, लक्ष्य एक
‘मानस ऋषि पंचमी’ के प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए बापू ने कहा कि अलग-अलग कालखंडों में ऋषि-मुनियों की साधना पद्धति और विचारधारा भिन्न रही, लेकिन उनका मूल उद्देश्य मनुष्य को उसके आत्मतत्व और परमात्मा की ओर ले जाना रहा है। उन्होंने आत्मबोध को साधना की महत्वपूर्ण दिशा बताया।
प्रारब्ध का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अयोध्याकांड में वशिष्ठ जी भरत जी को हरि की इच्छा की महत्ता समझाते हैं। मनुष्य के जीवन में भविष्य और प्रारब्ध अपनी गति से चलते हैं।

‘कृपा किसी पर भी हो सकती है’
भगवान की कृपा के स्वरूप पर चर्चा करते हुए बापू ने कहा कि कृपा केवल भक्तों तक सीमित नहीं है। उन्होंने श्रीराम और रावण के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि रावण का वध होने के बाद भी उसे परमधाम की प्राप्ति हुई। उन्होंने इसे प्रभु की कृपा के रूप में व्याख्यायित किया।

युद्ध के बाद श्रीराम द्वारा इंद्र से वानर सेना को पुनर्जीवन का वर मांगने के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि प्रभु की कृपा वानर सेना के साथ रावण की सेना पर भी हुई।

‘रामकथा अनंत जन्मों तक गानी है’
बापू ने भावपूर्ण अंदाज में कहा कि रामकथा गाने और सुनने का अवसर जीवन का सौभाग्य है। उन्होंने कहा कि यदि एक जन्म में रामकथा गाने का अवसर न मिले तो अनेक जन्मों तक रामकथा गाने की कामना रहेगी। उन्होंने श्रद्धालुओं के प्रेम और आत्मीयता के प्रति भी भाव व्यक्त किए।

बच्चों को मोबाइल दें, लेकिन विवेक के साथ
बच्चों के मोबाइल इस्तेमाल से जुड़े प्रश्न पर बापू ने अभिभावकों से विवेकपूर्ण निगरानी रखने की बात कही। उन्होंने कहा कि बच्चे स्वभाव से जिज्ञासु और चंचल होते हैं। ऐसे में मोबाइल देने के साथ यह भी देखना जरूरी है कि वे किस प्रकार की सामग्री देख रहे हैं और उसका उनके संस्कारों एवं व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ रहा है।

सुंदरकांड में नौ बार आया ‘सुंदर’
श्रद्धालुओं की प्रश्न-पत्रियों का उत्तर देते हुए बापू ने सुंदरकांड के नाम की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि सुंदरकांड में ‘सुंदर’ शब्द नौ बार आता है और भारतीय परंपरा में नौ अंक को पूर्णता से जोड़ा जाता है। इसके बाद कथा शिव-सती विवाह और सती त्याग के प्रसंग की ओर बढ़ी। कथा पंडाल में एक बार फिर राधे-राधे के संकीर्तन की गूंज सुनाई दी और श्रद्धालु भक्ति भाव में सराबोर नजर आए।

‘राधा नाम फल नहीं, रस है’
बापू ने कहा कि “राधा नाम फल नहीं, रस है।” उन्होंने राधा-कृष्ण के प्रेम और भक्ति को भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण भाव बताते हुए कहा कि रामनाम का स्मरण भी मनुष्य को परम प्रेम और भक्ति की ओर ले जाने वाला मार्ग है।

‘एक भरोसो, एक बल...’ से निर्भयता का संदेश
तुलसीदास की पंक्ति “एक भरोसो, एक बल, एक आस विश्वास” का स्मरण कराते हुए बापू ने कहा कि ईश्वर पर भरोसा मनुष्य के भीतर से भय को कम करने और उसे विश्वास के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। उन्होंने सुग्रीव के प्रसंग का उल्लेख करते हुए श्रीराम के आश्वासन और निर्भयता के संदेश को सामने रखा।

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