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: साहित्यकार डॉ. राजेश्वर प्रसाद चतुर्वेदी के स्मृति ग्रंथ, हास्य व्यंग्य, साहित्य निबंध संकलन का पद्मश्री डॉ. आरएस पारीक ने किया विमोचन

Pragya News 24

Sun, Nov 9, 2025
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आगरा। एक बार मैं उज्जैन गया था तो वहां लोगों से महाकवि कालिदास के विषय में पूछा बहुत कम लोग उनको जानते थे। फिर एक बार इंग्लैंड के स्ट्रेटफोर्ड में गया, जहां शेक्सपियर ने जन्म लिया, वहां हर गली और सड़क से झलक रहा था कि यह शहर शेक्सपियर का है। हमें अपने देश में साहित्यकारों और कलाकारों के प्रति व्याप्त उदासीनता को समाप्त करना होगा, कालीदास जी कालजयी रचनाकार थे, आगरा की ऐसी ही शख्शियत थे डॉ. राजेश्वर प्रसाद चतुर्वेदी जी, उनकी व अन्य रचनाकारों की स्मृतियों की झलक अपने आगरा में दिखनी चाहिए। यह विचार अध्यक्षीय संबोधन में पद्मश्री डॉ. आरएस पारीक ने रविवार को आगरा पब्लिक स्कूल विजय नगर में आयोजित उनके तीन ग्रंथों के विमोचन समारोह में व्यक्त किए। डॉ. आरएस पारीक ने कहा, डॉक्टर राजेश्वर प्रसाद चतुर्वेदी ने दुर्लभ रचनाएं रख छोड़ी हैं, उनकी स्मृतियों को प्रो. आभा चतुर्वेदी अमिट बनाने का काम कर रही हैं।

उपकार प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इन तीन पुस्तकों में प्रो. राजेश्वर प्रसाद चतुर्वेदी स्मृति ग्रंथ सहित उनके हास्य व्यंग्य और साहित्य निबंधों का संकलन प्रस्तुत किया गया है। इन ग्रंथों का संपादन प्रो. आभा चतुर्वेदी, प्रो. सुषना सिंह, रामानुज भारद्वाज, संजय मिश्र, नेहा चतुर्वेदी ने किया है। संपादन में डॉ. निशीथ चतुर्वेदी, रमेश पंडित, ब्रज बिहारी लाल बिरजू और डॉ.अरुण राघव ने भी सहयोग किया है।

मुख्य अतिथि पद्मश्री प्रो (डॉ.) उषा यादव ने संबोधन में कहा, डॉ. राजेश्वर प्रसाद चतुर्वेदी ने जो रेखाएं खींची हैं उनमें रंग भरने का काम उनका परिवार कर रहा है। मुझे पूरा विश्वास है कि उनकी यादों का दीपक सदैव इसी प्रकार जलता रहेगा। डॉ. चतुर्वेदी जी में जो मानवीयता थी, जो समाज से जुड़ने का भाव था, वह अविस्मरणीय है।

विशिष्ट अतिथि संस्कृतिकर्मी अरुण डंग ने कहा, भले ही तकनीक का विस्तार हो रहा है, लेकिन साहित्य का अपना महत्व बना रहना सुनिश्चित है।

डॉ. राम मनोहर लोहिया हॉस्पिटल दिल्ली के रिटायर्ड डायरेक्टर डॉ. निशीथ चतुर्वेदी ने स्वागत भाषण में डॉ. राजेश्वर प्रसाद चतुर्वेदी जी के व्यक्तित्व-कृतित्व को रेखांकित किया। अमित चतुर्वेदी ने भी विचार व्यक्त किए। प्रो. राजेश प्रसाद चतुर्वेदी की सुपुत्री प्रो. आभा चतुर्वेदी ने कहा, मैंने जब होश संभाला तो पिताजी को लिखते हुए ही पाया। आखिरी बार जब वो लिख रहे थे तो उनको 104 बुखार था। अपने जीवन के अंतिम दिनों में भी उन्होंने हमें बोल बोलकर लिखाया, उनकी पांडुलिपियां सुरक्षित हैं। महेश शर्मा ने बताया कि, ष्मैं जब बहन आभा चतुर्वेदी से भईया दौज पर टीका करवाने गया, तो देखा अलमारियां भरी पड़ी हैं, मैंने ही इनको ग्रंथ के रूप में प्रकाशित कराने का सुझाव दिया, तब यह पांच साल में प्रकाशित हुआ है।

अन्य वक्ताओं में डॉ. रंजीत सिंह भदौरिया, प्रो. बीना शर्मा, प्रो. शैफाली चतुर्वेदी, डॉ. नीलम भारद्वाज, डॉ. मधु भारद्वाज, संजय मिश्रा, रामानुज भारद्वाज आदि ने भी विचार व्यक्त किए।

शुरुआत में शुभारंभ मंचासीन अतिथियों पद्मश्री डॉ. आरएस पारीक, पद्मश्री उषा यादव, अरुण डंग, महेश शर्मा, डॉ. निशीथ चतुर्वेदी और अमित चतुर्वेदी आदि ने किया। उद्घाटन बाद शारदा वंदना सुशील सरित ने प्रस्तुत की। स्वागत प्रो. आभा चतुर्वेदी, शुभ्रा चतुर्वेदी, संजय मिश्रा, रामानुज भारद्वाज, अंजना चतुर्वेदी, गोपाल मिश्र, ज्ञानेश चतुर्वेदी, किशन चतुर्वेदी, नेहा चतुर्वेदी मुस्कान चतुर्वेदी आदि ने किया। मंच संचालन श्रुति सिन्हा ने किया। धन्यवाद ज्ञापन महेश शर्मा ने किया।

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