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: श्री खाटू श्याम जी की भजन संध्या में झूमे भक्त, मनमोहक झांकी ने बांधा समा

Pragya News 24

Fri, Nov 7, 2025
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आगरा। बल्केश्वर स्थित गौशाला प्रांगण में चल रहे श्रीकृष्ण लीला महोत्सव में लीला मंचन के विश्राम के बाद गुरुवार की रात्रि भक्ति रस से सराबोर भजन संध्या का आयोजन हुआ। श्री खाटू श्याम जी के भजनों की मधुर गूंज ने समूचे वातावरण को भक्तिरस में डुबो दिया। मंच पर सजी श्री खाटू श्याम जी की मनमोहक झांकी को देखकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।
लक्ष्मण शर्मा ने अध्यक्ष मनीष अग्रवाल एवं सुजाता अग्रवाल से विधि विधान से पूजन करवाया। मुख्य अतिथि गोवर्धन से आए चैतन्य हरि चरत जी महाराज ने आरती की। भजन गायकों ने “खाटू में आज बुलावे श्याम”, “मैं तो श्याम दीवानी हो गई”, “श्याम तेरी महिमा न्यारी है” , शान है ये पूरे भारत की, गाय नहीं कटने देंगे जैसे लोकप्रिय भजनों से उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया। श्रद्धालु हाथों में जयकारे और दीप लिए भक्ति में मग्न झूमते नजर आए।

भजन संध्या संयोजक लक्ष्मण शर्मा ने बताया कि “प्रत्येक वर्ष की भांति इस बार भी श्री खाटू श्याम जी की भजन संध्या भक्तों के लिए अविस्मरणीय रही। श्याम नाम का स्मरण और संगीत का संगम, भक्तों को आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति कराता है।

शुक्रवार को होगा हवन संग लीला महोत्सव का विश्राम
अध्यक्ष मनीष अग्रवाल ने बताया कि शुक्रवार को श्रीकृष्ण लीला महोत्सव के 14 दिवसीय आयोजन का समापन हवन पूजन एवं स्वरूपों की विदाई के साथ किया जाएगा। यह लीला न केवल भक्ति का पर्व है बल्कि समाज में एकता और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक भी है।

ये रहे उपस्थित
सचिन सारस्वत, विजय रोहतगी, नीरू रोहतगी, आशु रोहतगी, शेखर गोयल, रेणु गोयल, अशोक गोयल, ब्रजेश अग्रवाल, अनूप गोयल, केके अग्रवाल, मनोज बंसल, अनंत उपाध्याय ममता, संजय गर्ग मनोज नागा, विष्णु अग्रवाल, तनुराग गोयल, नीलिमा गोयल, संजय चेली, राजेंद्र अग्रवाल आदि उपस्थित रहे।

रास : आत्मा और परमात्मा का दिव्य मिलन - स्वामी प्रदीप शर्मा ठाकुर जी महाराज, रास बिहारी कृपा सेवा ट्रस्ट
रास लीला ब्रज की अद्भुत और अलौकिक परंपरा है, जिसमें नव रसों का समावेश होता है। यह केवल नृत्य या गायन नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है। रास में चारों वेदों का सार निहित हैI इसके गायन में सामवेद का भाव प्रकट होता है। सूरदास, नंददास, कुंभदास, स्वामी हरिदास और हरिवंश जी जैसे संतों ने रास के माध्यम से ठाकुर जी की लीलाओं को ब्रज भाषा में अभिव्यक्त किया। स्वामी हरिवंश जी के अनुसार, “चंद्र मिटे, दिनकर मिटे, मिटे त्रिगुण विस्तार; ड्रोबात श्री हरिवंश को मिटे न नित विहार” - अर्थात संसार मिट सकता है, परंतु ठाकुर जी का रास अमर है। रास के दर्शन साधारण दृष्टि से नहीं होते; इसके लिए गोपी भाव और भक्ति की गहराई आवश्यक है। यही कारण है कि स्वयं भोलेनाथ ने वृंदावन में आकर गोपी भाव धारण किया। रास नश्वर नहीं, यह रसिकों के लिए परम धन और दिव्यता का स्रोत है।

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